(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.61. अध्यायः 061
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरंप्रति भीष्मेण ब्राह्मणधर्मकथनम्॥ 1॥
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-61-0x(6685)(80775)
पुनः शिवान्महोदर्कानहिंस्रांल्लोकसंमतान्।
ब्रूहि धर्मान्सुखोपायान्मद्विधानां सुखावहान्॥ 12-61-1(80776)
भीष्म उवाच। 12-61-2x(6686)
ब्राह्मणस्य तु चत्वारस्त्वाश्रमा विहिताः प्रभो।
वर्णास्तान्नानुवर्तन्ते त्रयो भारतसत्तम॥ 12-61-2(80777)
उक्तानि कर्माणि बहूनि राज
न्स्वर्ग्याणि राजन्यपरायणानि।
शास्त्रस्य सर्वस्य विधौ स्मृतानि
क्षात्रे हि सर्वं विहितं यथावत्॥ 12-61-3(80778)
क्षात्राणि वैश्यानि च सेवमानः
शौद्राणि कर्माणि च ब्राह्मणः सत्।
अस्मिँल्लोके निन्दितो मन्दचेताः।
परे च लोके निरयं प्रयाति॥ 12-61-4(80779)
या संज्ञा विहिता लोके दासे शुनि वृके पशौ।
विकर्मणि स्थिते विप्रे तां संज्ञां कुरु पाण्डव॥ 12-61-5(80780)
षट्कर्मसंप्रवृत्तस्य आश्रमेषु चतुर्ष्वपि।
सर्वधर्मोपपन्नस्य तद्भूतस्य कृतात्मनः॥ 12-61-6(80781)
ब्राह्मणस्य विशुद्धस्य तपस्यभिरतस्य च।
निराशिषो वदान्यस्य लोका ह्यक्षरसंज्ञिताः॥ 12-61-7(80782)
यो यस्मिन्कुरुते कर्म यादृशं येन यत्र च।
तादृशं तादृशेनैव सगुणं प्रतिपद्यते॥ 12-61-8(80783)
वृद्ध्या कृषिवणिक्त्वेन जीवसंजीवनेन च।
वेत्तुमर्हसि राजेन्द्र स्वाध्यात्मगुणितेन च॥ 12-61-9(80784)
कालसंचोदितः काले कालपर्यायनिश्चितः।
उत्तमाधममध्यानि कर्माणि कुरुतेऽवशः॥ 12-61-10(80785)
अन्तवन्ति प्रदानानि परं श्रेयस्कराणि च।
स्वकर्मविहितो लोको ह्यक्षरः सर्वतोमुखः॥ ॥ 12-61-11(80786)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि एकषष्टितमोऽध्यायः॥ 61॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-61-6 षट्कर्माणि प्राणायामः प्रत्याहारो ध्यानं धारणा तर्क समाधिरिति। इज्यादीनामाश्रमान्तरेष्वयोगात्। सर्वधर्मोऽहिंसा॥ 12-61-7 तपसि विचारे। अक्षरसंज्ञिताः अक्षयाः॥ 12-61-8 यः पुमान्यस्मिन्नवस्थाविशेषे यत्र देशे काले वा येन फलेन निमित्तेन यत्कर्म करोति साध्वसाधु वा तत्सकलं लोभाच्चिराभ्यासाच्च सगुणमेवेति प्रतिपद्यते नत्विदं निन्द्यमिति ततो विरज्यत इत्यर्थः॥ 12-61-9 जीवै संजीवनं मृगयाजीवित्वं तेन। वृभ्द्यादिभिः समानमिति हेत्तुमर्हसि उक्तहेतोरित्यर्थः॥ 12-61-10 कालेन पर्येत्याविर्भवतीति कालपर्यायः प्राग्भवीयो वासनासमूहस्तेन निश्चितः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.